Sunday, 16 August 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 16 अगस्त 2026 (रविवार)

 ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

16 अगस्त 2026 (रविवार)




कार्यक्रम सारांशिका ( कार्यवृत्ति)

स्वतंत्रता दिवस विशेष आयोजन 🇮🇳

📚 राष्ट्रीय साहित्यिक संवाद सभा तथा काव्य गोष्ठी

महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष साहित्यिक आयोजन सम्पन्न हुआ।

✨ मुख्य विषय:
“प्रसाद साहित्य में राष्ट्रीय चेतना : स्वाधीनता से राष्ट्रनिर्माण तक”

उपविषय:
“इतिहास, संस्कृति, स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों के संदर्भ में”

📅 दिनांक: 16 अगस्त 2026 (रविवार)
⏰ समय: सायं 4:00 से 6:00 बजे तक
💻 माध्यम: Google Meet ,(ऑनलाइन)

🎙️ प्रथम वक्ता-

🌟 सी.ए. शंकर घनश्यामदास अंडानी जी
संस्थापक, SAAI एंड कंपनी एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट; सामाजिक सेवा एवं जनकल्याण के क्षेत्र में सक्रिय प्रतिष्ठित व्यक्तित्व।

🌹 द्वितीय वक्ता
डॉ. आरती पाठक
विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, कालिंदी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

विशेष स्वतंत्रता दिवस विमर्श-
प्रसाद साहित्य में राष्ट्रबोध, स्वाधीनता की चेतना, भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और राष्ट्रनिर्माण की भावना पर सार्थक एवं विचारोत्तेजक संवाद हुआ।

👥 आयोजक मंडल:
विशाल मालवीय | अवधेश कुमार गुप्ता | डॉ. कविता प्रसाद और डॉ. महालक्ष्मी केशरी की उपस्थिति में कार्यक्रम आयोजित हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ.शिप्रा मिश्रा की मधुर कंठ से मां वाणी की वाणी वंदन द्वारा हुआ।


प्रथम वक्ता के रूप में सी. ए. शंकर घनश्याम अंडानी जी ने -

प्रसाद के समग्र साहित्य को केंद्र में रखते हुए विशेष तौर से उनके नाटकों और कविताओं की चर्चा की । जिसमें उन्होंने "अरुण यह मधुमय देश हमारा "और "हिमाद्रि तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती" जैसी पंक्तियों का बखान करते हुए राष्ट्रीय चेतन और स्वाधीनता जैसे विषयों को केंद्र मैं रख कर अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। साथी उन्होंने प्रसाद के उपन्यासों पर भी चर्चा पर चर्चा किया। तत्पश्चात

द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ.आरती पाठक ने -

प्रसाद के साहित्य की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए बताया कि प्रसाद जी अभाव में भी भाव की भावना से परिपूर्ण थे। वह जिस समय लिख रहे थे उनके पास उतनी सुविधा नहीं थी फिर भी उन्होंने अपने ज्ञानानुभव से हिंदी साहित्य को ऐसे बहुमूल्य साहित्यिक रत्न प्रदान किए कि जिनको सामान्य पाठक भी पढ़ ले तो 25% प्रभावित अवश्य ही हो जाएगा। उन्होंने प्रसाद के नाटक चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी सभी पर प्रकाश डालें। साथ ही हिंदी भाषा के प्रभाव को भी बताया। प्रसाद जी अपने जीवन में लालच के उद्देश्य से नहीं लिख रहे थे। उन्हें साहित्य की सेवा करनी थी और देश को जागरुक कर राष्ट्रीय चेतना का संदेश प्रदान करना था, इस भाव से वह बहुत कुछ लिख गए।


प्रश्नोत्तर सत्र-

कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया जिसमें प्रथम प्रश्न करता रहे डॉ.कामाख्या नारायण जी..

अपने प्रश्न किया कि- "इतना उत्कृष्ट प्रसाद साहित्य रचित होते हुए भी आज तक देश प्रेम और राष्ट्र प्रेम इतना ढलान पर क्यों आ गया है?"

दूसरे प्रश्न के रूप में अवधेश गुप्ता जी ने प्रश्न रखा - "आज के कवियों को या रचनाकारों को प्रसाद जी से क्या सीखना चाहिए?"

पूछे गए प्रश्नों का उत्तर मुख्य वक्ताओं ने बड़े ही सारगर्भित ढंग से प्रसाद जी की रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। जिससे कार्यक्रम में उपस्थित सभी सहमत हो सके।


इसके साथ ही माननीय श्री साहितेंदु जी ने कालिदास, तुलसीदास और प्रसाद जी का साहित्य विवेचित करते हुए प्रसाद जी के साहित्य की महिमा का बखान किया और साथ ही प्रसाद साहित्य को इसलिए पढ़ना चाहिए क्योंकि हम अपने आप को जान सके । यह जरूरी है ऐसा उन्होंने कहा।

श्री मधुसूदन आत्मीय जी ने प्रसाद जी के साहित्य को समेटे हुए वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता की चर्चा परिचर्चा की।

इसके साथ ही अशोक कुमार गोयल जी ने अपनी कविता"हिमाद्री के श्रृंग से जो उठती पुकार आज" का काव्य पाठ किया।"

तत्पश्चात धर्म सिंह चक्रवर्ती ने अपनी कविता - " जब तक चांद में शीतलता और रुदन करने में तेज रहे।" का काव्य पाठ किया।

साथ हीआशीष जी ने अपनी कविता-'राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह की बलिदानी' का काव्य पाठ किया।

इसके बाद विनय विक्रम सिंह जी ने भी प्रसाद जी की प्रशंसा करते हुए उनकी भाषा विषयक दृष्टि पर
प्रकाश डाला।

इसी क्रम में मीनू शर्मा जी ने भी प्रसाद जी पर अपने विचार अभिव्यक्ति किए।


उपस्थित श्रोता एवं सहभागी-

कार्यक्रम में निम्नलिखित विद्वानों, साहित्यकारों , शोधार्थियों एवं सहभागियों की गरिमामयी उपस्थिति रही-

अमरजीत, अलका गुप्ता,अशोक कुमार गोयल, डॉ शिप्रा मिश्रा ,डॉ सुशील कुमार 'साहितेंदु',डॉ आरती पाठक, विनय विनोद कुमार, विनोदिनी गुप्ता, मनीष गोयल, विभा रंजन, जय प्रकाश तिवारी, मनीषा गोवाली, अंजली कुमारी, अर्चना गुप्ता ,धर्म सिंह चक्रवर्ती, प्रतिमा नलिनी, डॉ योगेंद्र कुमार, कृष्णा राम ,आशीष अंबर, रतन कुमार,पारुल भारद्वाज और सरवना केच।

कार्यक्रम का संचालन-

संपूर्ण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक संचालन डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने किया । उन्होंने कार्यक्रम के सभी बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए एक कुशल संचालन का कार्यभार बखूबी निभाया ।


कार्यक्रम का समापन और धन्यवाद ज्ञापन-

डॉ.योगेंद्र कुमार जी ने मुख्य वक्ताओं सहित आयोजक मंडल के सदस्यों, कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकारों, कवियों, विचारकों सहित समस्त श्रोतावृंद को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम की प्रशंसा की। अंत में कार्यक्रम के समापन की घोषणा की गई।





Sunday, 9 August 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 09 अगस्त 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

09 अगस्त 2026 (रविवार)




कार्यक्रम सारांशिका (कार्यवृत्ति)

राष्ट्रीय साहित्यिक संवाद सभा तथा काव्य गोष्ठी

महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक संवाद सभा तथा काव्य गोष्ठी का आयोजन दिनांक 9 अगस्त 2026, रविवार को सायं 4:00 बजे से 6:00 बजे तक Google Meet के माध्यम से किया गया।

विषय

“प्रसाद के नाटकों में राजनीतिक चेतना : तात्कालिक विमर्श”

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं वक्ता के रूप में—

डॉ. योगेंद्र कुमार
सहायक आचार्य, संस्कृत
संस्कृत नेशनल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, बरहलगंज, गोरखपुर

एवं

प्रो. अलका पाण्डेय, डी.लिट्.
प्रोफेसर, हिंदी विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

की गरिमामयी उपस्थिति एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में प्रश्नोत्तरी सत्र एवं काव्य-पाठ विशेष आकर्षण के केंद्र रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ लिटरेचरनामा संस्थान के प्रमुख श्री विशाल मालवीय जी ने किया। उन्होंने सर्वप्रथम माँ वीणा के वाणी-वंदन हेतु श्री कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’ को आमंत्रित किया। कमलेश जी ने अपने मधुर कंठ से माँ वीणा की आराधना प्रस्तुत कर कार्यक्रम का मंगलाचरण किया।

तत्पश्चात महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की संरक्षिका डॉ. कविता प्रसाद एवं संरक्षक श्री अवधेश गुप्ता जी ने मुख्य वक्ताओं सहित उपस्थित समस्त वरिष्ठ साहित्यकारों, शोधार्थियों, विद्वानों एवं सुधी श्रोतावृंद का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया।

प्रथम वक्ता — डॉ. योगेंद्र कुमार

कार्यक्रम के प्रथम प्रमुख वक्ता डॉ. योगेंद्र कुमार ने विषय की गंभीर एवं व्यापक चर्चा प्रस्तुत की। उन्होंने जयशंकर प्रसाद के नाट्य-साहित्य को केंद्र में रखते हुए राजनीतिक चेतना के विभिन्न आयामों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।

उन्होंने विशेष रूप से प्रसाद के ‘चंद्रगुप्त’ नाटक के माध्यम से विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए राजनीतिक चेतना, राष्ट्रभावना और राष्ट्रीय स्वाभिमान के विभिन्न पक्षों की व्याख्या की। उन्होंने जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक अवदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे विराट साहित्यकार विरले ही जन्म लेते हैं।

उन्होंने प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्ति—

“हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती”

के संदर्भ में राष्ट्रप्रेम की व्यापक अवधारणा पर प्रकाश डाला तथा प्रसाद के साहित्य में निहित राष्ट्रीय चेतना को विविध आयामों से समझाया।

द्वितीय वक्ता — प्रो. अलका पाण्डेय

द्वितीय प्रमुख वक्ता प्रो. अलका पाण्डेय जी ने भी प्रसाद के नाटकों को केंद्र में रखते हुए विषय पर अत्यंत गंभीर, विचारोत्तेजक एवं सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया।

उन्होंने ‘अजातशत्रु’, ‘ध्रुवस्वामिनी’, ‘स्कंदगुप्त’, ‘चंद्रगुप्त’ आदि नाटकों के माध्यम से प्रसाद की राजनीतिक चेतना और उनके ऐतिहासिक दृष्टिकोण को विस्तार से समझाया।

उन्होंने प्रसाद के नाटकों में इतिहास, राजनीति, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के अंतर्संबंधों पर चर्चा करते हुए उनकी प्रासंगिकता को वर्तमान संदर्भ से भी जोड़ा। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इतिहास केवल अतीत का अध्ययन नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए दिशा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

प्रश्नोत्तरी सत्र

कार्यक्रम की अगली कड़ी में विद्वान वक्ताओं के साथ प्रश्नोत्तरी सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में अमरजीत एवं ‘द राम’ ने अपने महत्वपूर्ण प्रश्न प्रस्तुत किए।

अमरजीत का प्रश्न:
जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ में समरसता की अभिव्यक्ति किस प्रकार हुई है और वर्तमान संदर्भ में उसकी उपादेयता क्या है?

‘द राम’ का प्रश्न:
क्या जयशंकर प्रसाद के नाटकों पर शेक्सपियर का प्रभाव है?

दोनों प्रश्नों पर आमंत्रित वक्ताओं ने विस्तारपूर्वक एवं सारगर्भित उत्तर प्रस्तुत किए। प्रश्नोत्तरी सत्र के माध्यम से विषय के अनेक महत्वपूर्ण पक्षों पर विमर्श हुआ, जिससे उपस्थित विद्वान श्रोताओं एवं सहभागियों को विषय को और गहराई से समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

उपस्थित श्रोता एवं सहभागी

कार्यक्रम में निम्नलिखित विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं सहभागियों की गरिमामयी उपस्थिति रही—

डॉ. कविता प्रसाद, अमरजीत, अल्का वार्ष्णेय, अनीता खरे, अशोक गोयल, बृजेश यादव, दिनेश कुमार केसरी, डॉ. जे. एस. यादव, डॉ. आशुतोष शास्त्री, कृष्णा राम चौहान, मधुसूदन आत्मीय, मीनू शर्मा, वंदना, रश्मि अग्रवाल, राजेश कुमार सिंह, रत्ना यादव, सानू कुमार, सीमा कुशवाहा, राम, सोनी स्वामी, रामउमेश वर्मा, अमरीश दुबे, अशोक शुक्ला, विनोद तिवारी यादव, दिनेश कुमार, डॉ. जे. एस. राजपूत यादव, डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहितेंदु’, डॉ. योगेश कुमार, डॉ. अंजनी कुमार, शालिनी, मुकेश, राम, अखिलेश यादव, सच्चिदानंद शाह, विभा रंजन, शैलेंद्र मिश्रा, अमिताभ सिंह, ओम आनंद आदि।

कार्यक्रम का संचालन

संपूर्ण कार्यक्रम का सफल एवं प्रभावी संचालन श्री विशाल मालवीय जी द्वारा किया गया। उन्होंने कार्यक्रम की सभी कड़ियों को क्रमबद्ध रूप से संचालित करते हुए वक्ताओं, सहभागियों एवं श्रोताओं के बीच सुंदर संवाद स्थापित किया।

धन्यवाद ज्ञापन एवं समापन

कार्यक्रम के अंत में डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने मुख्य वक्ताओं, दोनों आयोजक संस्थाओं तथा कार्यक्रम में उपस्थित समस्त विद्वान श्रोताओं एवं सहभागियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कार्यक्रम की सफलता के लिए आयोजक मंडल की सराहना करते हुए कामना की कि महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ऐसे साहित्यिक एवं बौद्धिक कार्यक्रम निरंतर आगे बढ़ते रहें तथा साहित्य, संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में अपनी सार्थक भूमिका निभाते रहें।

सभी उपस्थित विद्वानों एवं सहभागियों को धन्यवाद एवं प्रणाम अर्पित करते हुए उन्होंने कार्यक्रम के सफल समापन की घोषणा की।

कार्यक्रम का समापन साहित्य, संवाद एवं ज्ञान की निरंतर यात्रा को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।
@⁨all⁩






Saturday, 1 August 2026

✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 02 अगस्त 2026 (रविवार)

 
✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦

02 अगस्त 2026 (रविवार)





कार्यक्रम सारांशिका (कार्यवृत्ति)

विषय - "भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में महाकाव्य 'कामायनी'"

आयोजक:
महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट एवं लिटरेचरनामा संस्थान (संयुक्त तत्वावधान)

तिथि: 2 अगस्त 2026 (रविवार)
समय: सायं 4:00 बजे से 6:00 बजे तक
माध्यम: Google Meet

कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती अनीता खरे (ग्वालियर) द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण माँ वीणा वंदना से हुआ। इसके उपरांत महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट के संरक्षक श्री अवधेश कुमार गुप्ता ने मुख्य अतिथियों, वक्ताओं एवं समस्त विद्वज्जनों तथा श्रोताओं का आत्मीय स्वागत करते हुए अपने प्रेरणादायी उद्बोधन से कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।

व्याख्यान सत्र

1. प्रो. एस. वी. एस. एस. नारायण राजू

प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. एस. वी. एस. एस. नारायण राजू ने कहा कि कामायनी में मनु की 'चिंता' मानव जीवन के अंधकार और निराशा का प्रतीक है, जबकि 'श्रद्धा' ज्ञान, आशा और प्रकाश का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने उपनिषदों के आलोक में स्पष्ट किया कि प्रसाद जी ने कामायनी में व्यष्टि से समष्टि, अंधकार से प्रकाश तथा चिंता से आनंद की आध्यात्मिक एवं मानवीय यात्रा का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है। उनके अनुसार कामायनी का संदेश केवल बुद्धि का नहीं, बल्कि बुद्धि और हृदय के समन्वय द्वारा मानवता के कल्याण का संदेश है।

2. डॉ. कामाख्या नारायण सिंह

द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ. कामाख्या नारायण सिंह ने कहा कि जिस प्रकार कोई गोताखोर जितनी अधिक गहराई में उतरता है, उतने ही बहुमूल्य रत्न प्राप्त करता है, उसी प्रकार जयशंकर प्रसाद के साहित्य को भी वही व्यक्ति अधिक गहराई से समझ सकता है, जिसमें उतनी ही बौद्धिक एवं संवेदनात्मक क्षमता हो। उन्होंने प्रसाद जी के शब्द-प्रयोगों की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए 'बलि' शब्द की व्याख्या की। उनके अनुसार प्राचीन काल में 'बलि' का अर्थ व्यापक रूप से बलिदान था, किंतु आज उसका अर्थ संकुचित हो गया है, जो हमारी बदलती मानसिकता का परिचायक है।

3. आदरणीय मधुसूदन जी

अपने उद्बोधन में आदरणीय मधुसूदन जी ने जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि यद्यपि दोनों की साहित्य-दृष्टि भिन्न थी, फिर भी वे एक-दूसरे के साहित्यिक अवदान का सम्मान करते थे। उन्होंने अपनी कविता "समरसता का सनातन प्रसाद" प्रस्तुत करते हुए कहा—

«उन्नत सार्थक जीवन का
जयशंकर दे गए प्रसाद।
जिसने समझा साहित्य उनका,
मिटे उसके सारे अवसाद।।»

4. साहितेंदु जी

साहितेंदु जी ने अपने वक्तव्य में प्रसिद्ध दृष्टांत 'चार अंधे और हाथी' का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ और अनुभव के अनुसार ही जयशंकर प्रसाद के साहित्य की व्याख्या करता है। उन्होंने कहा कि प्रसाद का साहित्य अत्यंत व्यापक, समृद्ध और बहुआयामी है। कामायनी केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि मानवता, समरसता और नवयुगीन चेतना का महाकाव्य है, जिसे समझने के लिए गहन अध्ययन और संवेदनशील दृष्टि आवश्यक है।


काव्य गोष्ठी

काव्य गोष्ठी का शुभारंभ कवि धर्मसिंह चक्रवर्ती ने सरस्वती वंदना स्वरूप अपनी रचना "माँ शारदे तुम्हें पुकारूँ, आकर ज्ञान बढ़ा देना" के भावपूर्ण पाठ से किया।

इसके पश्चात प्रो. अनीता खरे ने विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में जयशंकर प्रसाद के साहित्य पर हो रहे शोध कार्यों तथा विद्यार्थियों की बढ़ती रुचि पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कामायनी के श्रद्धा प्रसंग को केंद्र में रखकर एक मार्मिक कविता प्रस्तुत की, जिसमें जीवन-निर्माण और मानवीय मूल्यों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई।

अशोक गोयल ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कामायनी की दार्शनिक चेतना पर आधारित अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—

«सनातन ज्ञान की पावन अनूठी धार है इसमें,
चिंता और आनंद का सुंदर सृजन-विस्तार है इसमें।»

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उपस्थिति

कार्यक्रम में अशोक गोयल, डॉ. मृदुल कीर्ति, डॉ. जे. एस. यादव, डॉ. सुशील कुमार पांडे, डॉ. ऋचा शर्मा, खुशी सिंह, मीनू शर्मा, नितिशा कौशल, रेणुका सिंह, सच्चिदानंद शाह, शैलेंद्र मिश्रा, सोनू कुमार, राजेश कुमार सिंह, सीमा कुशवाहा, धर्मसिंह चक्रवर्ती, राम, महेश, आशीष, बृजेश, रणवीर सिंह, जितेंद्र सहित अनेक साहित्यप्रेमी एवं विद्वज्जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।


संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन

कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावशाली संचालन डॉ. महालक्ष्मी केशरी ने किया।

अंत में श्रीमती कविता प्रसाद ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए विषय के प्रमुख बिंदुओं का सार प्रस्तुत किया। इसी के साथ कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। @all





✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 16 अगस्त 2026 (रविवार)

  ✦ साप्ताहिक संवाद सभा समाचार ✦ 16 अगस्त 2026 (रविवार) कार्यक्रम सारांशिका ( कार्यवृत्ति) स्वतंत्रता दिवस विशेष आयोजन 🇮🇳 📚 राष्ट्रीय साह...